“…वह क्या जाने!”
पा ही लेंगे अपनी मंज़िल
चल के ज़रा-ज़रा,
संघर्ष करने से जो लडखडाये
‘कामयाबी’ वो क्या जाने….!
हासिल कर लेंगे हर खुशियां
ग़म भुला के ज़रा-ज़रा,
रोने से जिसको फुरसत ना मिले
‘हंसना’ वो क्या जाने…!
कर लेंगे पुरे ख्वाब सच
मेहनत कर ज़रा-ज़रा,
मेहनत से जो कतराये
‘सच्चे ख्वाब’ वो क्या जाने…!
भर देती नन्ही बुंद भी
सागर को ज़रा-ज़रा,
सुविधाओ के मंच पर बसा
‘संघर्ष’ वो क्या जाने…!
मुस्कुराहट के पिछे छिप जाता दर्द
सबको दिखता हरा-भरा,
ना महसुस किया दर्द किसी का
‘गम’ वो क्या जाने….!
हर वो, जो दिखे चमकीला-सुनहरा
नही होता सोना खरा,
दिखावट पे जो इतराए
‘सच्चाई’ वो क्या जाऩे….!
हर दिन मरता किसी भय से
औ’ जीता डरा-डरा,
‘भयंकर’ है दुनिया उसके लिए
‘मस्ती’ वो क्या जाने…!
[वो=वह]
©हंसराज केरेकार ‘राजहंस’
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Photo Courtesy :hanskcreation (My Photo Gallery)
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