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Monday, June 1, 2020

"....वो क्या जाने!"

“…वह क्या जाने!”


पा ही लेंगे अपनी मंज़िल
चल के ज़रा-ज़रा,

संघर्ष करने से जो लडखडाये
‘कामयाबी’ वो क्या जाने….!

हासिल कर लेंगे हर खुशियां
ग़म भुला के ज़रा-ज़रा,

रोने से जिसको फुरसत ना मिले
‘हंसना’ वो क्या जाने…!

कर लेंगे पुरे ख्वाब सच
मेहनत कर ज़रा-ज़रा,

मेहनत से जो कतराये
‘सच्चे ख्वाब’ वो क्या जाने…!

भर देती नन्ही बुंद भी
सागर को ज़रा-ज़रा,

सुविधाओ के मंच पर बसा
‘संघर्ष’ वो क्या जाने…!

मुस्कुराहट के पिछे छिप जाता दर्द
सबको दिखता हरा-भरा,

ना महसुस किया दर्द किसी का
‘गम’ वो क्या जाने….!

हर वो, जो दिखे चमकीला-सुनहरा

नही होता सोना खरा,

दिखावट पे जो इतराए
‘सच्चाई’ वो क्या जाऩे….!

हर दिन मरता किसी भय से
औ’ जीता डरा-डरा,

‘भयंकर’ है दुनिया उसके लिए
‘मस्ती’ वो क्या जाने…!

[वो=वह]
©हंसराज केरेकार ‘राजहंस’
***

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